वो औरत है साहब…..

वो औरत है साहब उसे मत सताओ,
बड़े ही दर्द मे वो जीवन बिताती है |

वो घर बनाती है और घर सजाती है,
जीना दुस्वार है फिर भी जिए जाती है|

तपती धूप मे या घनी बरसात मे,
आप के साथ कदम से कदम मिलाती है |

कभी फ़ुर्सत निकाल के उसके दिल से भी पूछो,
खुद रो कर भी तुम्हे कैसे हसाती है|

पति हो, भाई हो, बाप हो या बेटा,
सबको खिलाने के बाद ही खुद खाती है|

सर्दी हो बुखार हो या कोई और बीमारी,
फिर भी वो पहले आप की ही दवा लाती है |

वो आधी दुनिया है उसे यूँ ना समझना,
यूँ ही नही वो देवी दुर्गा कहलाती है |

उसे मजबूर ना समझो वो मजबूत है,
घर तो क्या वो पूरी दुनिया चलाती है | ……. विनय प्रकाश मणि



Actually, Vinay is a writer by chance and writing is one of his passion. He love to pen down his thoughts in the form of blogs/articles & forums. He is a poet too :) Despite having a tough life, he is also passionate about the social relationship and he loves to interact with the new crowd across the globe.


'वो औरत है साहब…..' has 1 comment

  1. June 28, 2017 @ 11:35 am Prashant Mani Tripathi

    A very good message to those who think that womens are just burden on the society.
    This poem is a great example to reveal the vastness and the huge role of a women on our society.
    Really Great!!!

    Reply


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